सोमवार, 5 फ़रवरी 2018

चल संगी ठेला लगाबो


#चल_संगी_ठेला_लगाबो!
डिग्री ला बार के, चूल्हा जलाबो
#चल_संगी_ठेला_लगाबो!!
भजिया तलबो, चाय बनाबो
#चल_संगी_ठेला_लगाबो!!
भजिया छान के टैक्स पटाबो
#चल_संगी_ठेला_लगाबो!!
पढ़ई-लिखई के खर्चा ला बचाबो
#चल_संगी_ठेला_लगाबो!!
मुद्रा योजना ले झमाझम ठेला बनवाबो
#चल_संगी_ठेला_लगाबो!!
नौकरी के ठिकाना नहीं, काकर-काकर तिर गोहर लगाबो
#चल_संगी_ठेला_लगाबो!!
राहन दे अब काला-काला बताबो
#चल_संगी_तेकर_से_बढ़िया_ठेला_लगाबो!!
बस, अवैया चुनाई में यहू मन ला साथ लाबो, कारोबार ला बढाबो, साथ में भजिया तलवाबो
चल संगी ....

-हर्ष दुबे

मंगलवार, 29 अगस्त 2017

स्वयम्भू बाबा, नेता और भीड़

स्वयम्भू बाबा और मौजूदा नेता दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जानते हैं कैसे?

दोनों को चाहिए:
1. सामने झुकने वाले लोग
2. ताली पीटने वाली, वाहवाही करने वाली जनता
3. नाम/इज्जत/शोहरत
4. VVIP ट्रीटमेंट

दोनों की ज़रूरत:
1. भीड़
2. पैसा

दोनों में समानता:
1. दोनों झूठे होते हैं।
2. दोनों को बखूबी पता है, जनता कितनी बवेकूफ है।

अपनी इन चाहतों, इच्छाओं, जरूरतों को पूरा करने ये अक्सर मंच साझा करते हैं या एक दूसरे के कार्यक्रमों में जाकर उपस्थिति दर्ज करा कर एक दूसरे की वाहवाही करते हैं। इनमें एक गजब की आपसी समझ, गजब की तारतम्यता रहती है। समाजसुधारक बनते हैं और समाज को सबसे अधिक नुकसान भी यही करते हैं।
पिछले कुछ दशकों से ये एक शँखलित समूह की तरह कार्य कर रहे हैं। ये जानते हैं, इसमें नुकसान कम और फायदा ज्यादा है।

तो आदरणीय महानुभावों इनका चक्कर छोड़िए ना बाबा की बातों में आइये ना नेता की। इनके दोनों हाथों में लड्डू है पर वो लड्डू खरीदा आपके पैसे से गया है। दान-दक्षिणा करना है तो किसी जरूरतमन्द को पढा दीजिये और जरूरतमन्द आपके इर्द-गिर्द ही हैं, आसानी से मिल जाएंगे उतनी आसानी से बाबा-नेता नहीं मिलेंगे।

आप स्वयं ठगने तैयार बैठे हैं, इसलिए ठगाए जा रहे हैं। ये लोग भी एक प्रकार से चिटफंड वाले ही हैं, वो पैसा दुगना-तिगुना करने की बातें करते हैं, ये सुख, शांति, समृद्धि लाने की और आपको काट के निकल जाते हैं।  'भक्ति' की पट्टी हटाइये और विवेक से काम लीजिये।

" धूल चेहरे पर है, आप आईने को दोश दे रहे हैं "

अरे जो खुद दूसरों पर आश्रित हो वो आपका जीवन क्या बदलेगा, आपका जीवन, आपकी आदतें केवल आप बदल सकते हैं। उठिए वरना फिर कोई चंद्रास्वामी, कोई आसाराम, कोई रामपाल, कोई हरी चटनी वाला निर्मल, या सच्चा सौदा करने वाला झूठा, फरेबी आएगा और ठग के चला जाएगा।

टिप: अपवाद हर जगह, हर क्षेत्र में होते हैं। कुछ वाकई तपस्वी, सन्त, महात्मा हैं और कुछ वाकई में जनता के प्रतिनिधि होते हैं। हां और कुछ जागरूक जनता भी है जो ठगे हुओ पर हंसती है। उन अपवाद केसेस को मेरा प्रणाम।

हर्ष दुबे

गुरुवार, 20 जुलाई 2017

बटुकेश्वर दत्त, इतिहास और व्यवस्था



हम इस दौर में हैं जहाँ लोग खुद को देशभक्त बतलाने में तो सामने वाले को देशद्रोही का प्रमाण पत्र देने में मिनट की देरी नहीं करते। उन लोगों तक बात पहुँचनी चाहिए की देशभक्ति क्या है? देशभक्ति की परिभाषा का उन्हें ज्ञान ही नहीं। फिर जब देशभक्ति नहीं पता तो किस आधार पर सामने वाले को आप देशद्रोही होने का प्रमाण पत्र देते फिरते हैं। वैसे एक बार के लिए अगर मान भी लें कि आप देशभक्त हैं तो भी इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता , हमारी व्यवस्था ने, समाज ने जब बटुकेश्वर दत्त जैसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी को, क्रांतिकारी को भुला दिया तो आप कौन हैं? बटुकेश्वर दत्त को जानते हैं? ये वही हैं जिन्होंने शहीद भगत सिंह के साथ मिलकर सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेम्बली, दिल्ली में बम फोड़ा था, इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाए और अपनी गिरफ्तारी दी थी। आज़ादी के समय बटुकेश्वर दत्त जिंदा थे पर गुमनामी ने उन्हें अपनी आगोश में लेना शुरु कर दिया था।





जीविका चलाने के लिए सिगरेट फैक्टरी के इर्द-गिर्द घूमना, बिस्किट-डबलरोटी की फैक्ट्री में काम करने से लेकर बस चलाने के लिए परमिट लेने तक ना उनका इंक़लाब जिंदाबाद लगाने का नारा काम आया ना ही उनकी देशभक्ति। हमारी व्यवस्था कैसी है उसका उदाहरण देखिए कि जब बस चलाने के लिए परमिट लेने पटना हाई-कमिश्नर के पास गए तो उनसे बटुकेश्वर दत्त होने का प्रमाण मांगा गया।

अगर तब के राष्ट्रपति  स्व. राजेन्द्र प्रसाद जी तक बात ना पहुँची होती और उन्होंने कमिश्नर से दत्त को जानने की बात ना कही होती तो शायद चप्पल घिसते हुए ही दत्त का बाकी जीवन निकलना था, जैसा प्रायः सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने वालों का निकलता है। जितना संघर्ष दत्त ने आज़ादी पूर्व नहीं किया उससे कई ज्यादा संघर्ष उन्हें आज़ाद भारत में करना पड़ा। जिस दिल्ली में उन्होंने अपनी हिम्मत का परिचय दिया, भरी असेम्बली में बम फोड़ा, उसी दिल्ली में अंतिम समय में एक अपाहिज होकर जाना उनके लिये किसी विडम्बना से कम नहीं था। केंसर से पीड़ित दत्त ने पटना में ही अपना ज्यादा समय बिताया।  उनकी अंतिम इच्छा थी कि उनका अंतिम संस्कार भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव के पास ही किया जाए I तो भारत-पाक सीमा के करीब हुसैनीवाला में उनका अंतिम संस्कार आज ही के दिन 20 जुलाई 1965 को किया गया। शायद यही एकमात्र सम्मान हमारी व्यवस्था ने उन्हें दिया है।

आप बटुकेश्वर दत्त या उनके जैसे वीरों का ज़िक्र शायद ही कहीं पाएंगे। जितनी आसानी से आपको गोडसे पढ़ने मिल जाएगा उतनी आसानी से दत्त नहीं मिलेंगे। हमारी व्यवस्था, हमारा समाज मरने के बाद ही याद करता है, चाहे बटुकेश्वर दत्त हो या हम-आप में से कोई सामान्य व्यक्ति। फूल-माला, दो मिनट का तवज्जो सब जाने के बाद ही नसीब होते हैं। वैसी ये भी व्यवस्था का ही हिस्सा है कि आज राष्ट्रपति चुनाव के आने वाले परिणाम, हार/जीत के बीच किसी राजनेता ने उनकी पुण्यतिथि पर हुसैनिवाला जाना तो दूर उन्हें श्रद्धांजलि तक अर्पित नहीं की।  ये कुछ ऐसी चीजें हैं जो सवाल उत्पन्न करती हैं, खीज उत्पन्न करती हैं। क्या जरुरत थी उस 19 वर्ष के युवक को अग्रेजों के सामने असेम्ब्ली में बम फोड़ने की? गिरफ्तारी देने की? क्यों जवानी का समय अंग्रेजों की जेल में संघर्ष करते बिता दिया? दोस्तों के पास मुखाग्नि के अलावा क्या नसीब हुआ उन्हें? ऐसे अनेक सवाल हैं, जिनका जवाब शायद किसी के पास नहीं।

देशभक्ति बहुत बड़ी चीज़ है और देशद्रोह भी। चालू भाषा में, चलते-फिरते इनका उपयोग करना, प्रमाण पत्र बाँटते फिरने की आपकी-हमारी औकात नहीं है। ये केवल  अल्फाज़ नहीं हैं, हमारी स्वतंत्रता का, स्वतंत्रता आन्दोलन का सार है इन शब्दों में। अपना मत रखिये, वाद-विवाद करिये पर खुद को या आप जिस विचारधारा को मानते हैं उसे ही देशभक्त और अन्य को देशद्रोही मत साबित करने लगिये। जब व्यवस्था ने बटुकेश्वर दत्त को नहीं बक्शा तो आप-हम क्या चीज़ हैं! इतिहास पढ़िए, समझिये और सवाल उठाइये, क्योंकि

"The More You Know, Then You know, How Less You Know"


महान क्रांतिकारी स्व बटुकेश्वर दत्त को शीश झुकाकर नमन...


हर्ष दुबे 


गुरुवार, 5 मई 2016

मानवता पर भारी पड़ता मनोरंजन !

क्या ऐसी किसी सरकार का नाम ले सकते हैं जो खुद को गरीबों की सरकार, किसानों की सरकार न कहती हो? ऐसी कोई चुनावी सभा बता सकते हैं जिसमें किसानों के हित की बात न की गई हो? चाहे केंद्र सरकार हो या राज्य सरकार सभी खुद को किसानों का हितैषी ही बताते हैं. अगर वाकई में ऐसा है तब फिर क्यों हमारे अन्नदाताओं की स्थिति बद से बत्तर होती जा रही है? सच तो यह है की 60 करोड़ किसान केवल चुनावी हित साधने के एक माध्यम हैं, जिन्हें राजनीतिक दल न्यूनतम समर्थन मूल्य, बोनस, सिंचाई परियोजनाएं रुपी झुनझुना दिखाते हैं और अपना स्वार्थ साधते हैं. किसानों की हालत सुधारने पिछेल 7 दशकों में सैकड़ों कमिटियां गठित की जा चुकी हैं, सैकड़ों रिपोर्ट पेश किये जा चुके हैं, पर अपेक्षित परिणाम हासिल करने की आस अभी भी बनी हुई है. मौजूदा हालात यह है कि आज भी हम सिंचाई हेतु पूर्ण रूप से इंद्र देव पर निर्भर हैं.

एक तरफ पिछले २ वर्षों में औसत से कम वर्ष हुई है, देश के लगभग एक तिहाई गाँव सूखे कि चपेट में हैं, खेतों में देने के लिए पानी नहीं है वहीँ दूसरी ओर आईपीएल हेतु मैदान को हरा रखने, पानी बहाने में कोई कमी नहीं कि जा रही है. आईपीएल कराने की जिम्मेदारी आईपीएल संचालक समिति की है जो BCCI के अंतर्गत आती है, जिसका मुख्यालय मुंबई में है जो महाराष्ट्र कि राजधानी है और महाराष्ट्र ही सूखे से सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य भी है. बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक याचिका कि सुनवाई करते हुए 30 अप्रैल 2016 के बाद होने वाले मैचों को राज्य से बाहर स्थानांतरित करने को कहा है.
हम इतने असंवेदनशील क्यों हो गए हैं कि पैसों के आगे न हमें सूखे से फटी ज़मीन दिखाई पड़ती है और न ही अपनी खेत के पेड़ में लटका किसान. हमारी मानवता क्या मर चुकी है? पानी की बर्बादी को रोकने किसी व्यक्ति/संगठन को कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की नौबत ही क्यों आई? बर्बादी इसलिए कहूंगा क्योंकि किसी के जान से ज्यादा महत्वपूर्ण मनोरंजन कभी नहीं हो सकता. BCCI जो विश्व का सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड है, जिसकी कार्यकारणी में तमाम राजनीतिक दलों के बड़े-बड़े नेता शुमार हैं, क्या वह चाहता तो इस संवेदनशील मुद्दे पर खुद निर्णय लेकर एक सकरात्मक सन्देश नहीं दे सकता था? खिलाड़ियों की सुरक्षा के मद्देनज़र जब 2009 में आईपीएल दक्षिण अफ्रीका स्थानांतरित किया जा सकता है तो क्या का सालाना 5500 करोड़ कमाने वाला बोर्ड एक साल के लिए फिर कोई दूसरा देश नहीं तलाश सकता था?
वैसे बताना चाहूंगा कि BCCI एक स्वायत्त संस्था है, जो अपने पंजीयन के हिसाब से एक चैरिटेबल ट्रस्ट है और उच्च न्यायालय के निर्णय की मानें तो हर संस्था चाहे सरकारी हो या निजी या स्वायत्त सभी को अपनी कमाई का 2% हिस्सा CSR (कॉर्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी) के रूप में समाज को देना अनिवार्य है, अगर निर्णय का ही सम्मान सही रूप से किया जाए तो भी कितने ही किसानों को मदद मिल सकती है, पर जब सब एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं तो नियम का पालन करे कौन! कुल मिलाकर बात इतनी ही है कि आईपीएल मोटी कमाई का एक ऐसा धंधा बन चुका है कि सरकार कोई भी हो इसके खिलाफ आवाज़ कोई नहीं उठाना चाहता. चाहे खिलाड़ी हो या टीम मालिक, नेता हो या अधिकारी जेबें सबकी गरम हो रही हैं तो भला  क्यों कोई आवाज़ उठाए. रही बात आपकी-हमारी तो यहाँ बैठ कर गरियाने के अलावा हम भी कर भी क्या सकते हैं.
जय जवान, जय किसान...
हर्ष दुबे
भूतपूर्व छात्र, भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली.

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2016

प्रमाण पत्रों की सूचि में अब "देशभक्ति प्रमाण पत्र" भी!

जन्म प्रमाण पत्र, जाति प्रमाण पत्र, मृत्यु प्रमाण पत्र, शादी प्रमाण पत्र तो आपने सुना होगा। इनको पाने आपको अपने नगर पालिक निगम, तेहसील ऑफिस, कलेक्टरेट, के चक्कर भी काटने पड़े होंगे, पर अब एक और प्रमाण पत्र बनवा कर रखने की जरूरत आन पड़ी है, जो है "देशभक्ति प्रमाण पत्र"। मौजूदा समय को देखते हुए सलाह दूंगा इसे तत्काल बनवाइए और जहाँ जाना हो इसे साथ ले कर चलने की आदत डाल लीजिए। इसे अपने पास न रखने से गंभीर परिस्थिति का भी आपको सामना करना पड़ सकता है, बेहतर होगा तत्काल प्रभाव से इसे बनवाने भिड़ जाएं।
आप सोच रहे होंगे, आखिर ऐसा कौन सा दफ्तर है, कार्यालय है जो ऐसा प्रमाण पत्र बना कर देता होगा तो आपको बताना चाहूँगा की बस यहीं पर आ कर यह प्रमाण पत्र बाकी प्रमाण पत्रों से अलग हो जाता है, एक तरफ जहाँ आपको दफ्तर के ठोकर खाने पड़ते हैं, घूस देनी पड़ती है, तो वहीं इसके लिए केवल आपको अपने करीबी एक निक्कर धारी महापुरुष से मिलने की आवश्यकता है। उनके पास जाइये, उनके विचारधारा की सराहना कीजिये, प्रधानमंत्री की तारीफ कीजिये, इतना करने में आपको महज़ 5 मिनट का समय लगेगा और तत्काल देशभक्ति का प्रमाण पत्र आपके हाथ में होगा। वैसे आप चाहें तो Digital India Campaign का भी फायदा उठा सकते हैं। आपको करना सिर्फ इतना है कि सोशल मीडिया में मौजूद समाज के किसी तथाकित ठेकेदार को ढूँढना है (यह कार्य सुनने में ज़रूर कठिन लग रहा होगा, पर है उतना ही सरल) और वही पुराना तरीका, विचारधारा की सराहना कीजिये, प्रधानमन्त्री की तारीफ कीजिये बस फिर क्या घर बैठे आपको प्रमाण पत्र मिल जाएगा। इसमें हुआ क्या की निक्करधारि महापुरुष को ढूंढने की ज़हमत भी नहीं उठानी पड़ी और घर बैठे प्रमाण पत्र भी मिल गया।
लगे हाथ आपको इस अनोखे प्रमाण पत्र के फायदे से भी वाकिफ करा देता हूँ:
1. देशभक्ति प्रमाण पत्र रखा व्यक्ति कहीं भी कभी भी किसी पर भी बल प्रयोग करने का अधिकार रखता है।
2. वह चाहे तो बन्दूक उठा गोली मारने की भी बात कर सकता है और जरुरत पड़ने पर मार भी सकता है।
3. ऐसा प्रमाण पत्र पाते ही उस व्यक्ति को खुद ब खुद दूसरों को ऐसे प्रमाण पत्र देने का अधिकार मिल जाता है।
4. इनके अलावा आपको एक और अधिकार मिलता है, जिसमें लोगों को क्या खाना चाहिए और क्या नहीं यह भी आप ही निर्धारित करेंगे।

आप समझ रहे हैं ना कि कितने फायदे हैं इसके, तो बिना देर किये ऊपर बताए 2 तरीकों में से किसी भी एक का चयन कर देशभक्ति प्रमाण पत्र बनवाइए और फायदा उठाइये।
जय हिन्द।
(उम्मीद करता हूँ बिना देशभक्ति प्रमाण पत्र बनवाए भी 'जय हिन्द' कहने का तो अधिकार होगा मेरे पास)

रविवार, 13 दिसंबर 2015

“चार दिन की चांदनी फिर अंधियारी रात”

हमारे छत्तीसगढ़ राज्य के सरकारी महकमे को इस वाक्य को अपने प्रचार वाक्य के रूप में ग्रहण कर लेना चाहिए, क्यूंकि यहाँ जो भी निर्णय होते हैं उनकी वैद्यता 4 दिन से ज्यादा की नहीं रहती. उदाहरण स्वरुप दुपहिया वाहन चालकों के लिए हेलमेट अनिवार्यता का नियम. पुलिस मुख्यालय ने एक बार फिर दुपहिया वाहन चालकों द्वारा हेलमेट नहीं लगाने पर कार्यवाही करने के आदेश/निर्देश दिए हैं. इस प्रकार की मुहीम पहले बार लागू की गई है ऐसा नहीं है इसके पहले भी पचीसों बार हेलमेट अनिवार्यता के लिए मुहीम छेड़ी गई है पर किसी भी बार इसकी अवधि 4 दिन से ज्यादा की नहीं रहती. कारण, बिना सोचे समझे लिए गए निर्णय.
रायपुर जैसे शहर में जहाँ पुरानी बस्ती, रामसागरपारा, MG रोड, मालवीया रोड, गुढ़ियारी, स्टेशन रोड, सादर बाजार, गोल बाजार, जैसे इलाके हैं. इन इलाकों के सड़कों की चौड़ाई महज़ 40-50 फ़ीट होगी, जिनमें चाह कर भी इंसान 30 की.मी. प्रति घंटे से ज्यादा की गति में वाहन चला नहीं सकता वहां हेलमेट पहन कर गाड़ी चलाने कहना क्या समझदारी है? यहाँ से आप किसी भी पहर में गुज़रिये बिना जाम में फंसे इन रास्तों से निकल पाना असंभव है. इस प्रकार के आदेश थोपने वाले अधिकारियों से मेरा आग्रह है कि जिन मार्गों का मैंने ज़िक्र किया है उन मार्गों पर कुछ दिन हेलमेट के साथ और कुछ दिन बिना हेलमेट के दुपहिया चलाते हुए निकलें शायद तब जा कर उनको ये बातें समझ आएंगी जिस तरफ मैं उनका ध्यान आकर्षित करना चाह रहा हूँ. निःसंदेह हेलमेट सुरक्षा की दृष्टी से अनिवार्य होना चाहिए पर शहर के बाहरी इलाकों में ना की शहर के तंग सड़कों के लिए. सड़क किनारे अवैध रूप से गुमटियां लगाने वाले, ठेला लगाने वाले, दूकान के बहार अवैध रूप से सामान बिछाने वालों पर कार्यवाही करना छोड़ इस प्रकार के बेतुके निर्देश निकालने में कोई समझदारी नहीं है. 
ज़रूरत है पहले आवागमन के मार्गों से इन अवैध कब्जाधारियों को हटाने की, तब जाकर मार्ग वाहन चलाने योग्य बनेंगे और अगर फिर हेलमेट अनिवार्य किया जाए तो निर्देशों का पालन भी होगा.  अन्यथा 4 दिन पुलिस चौक-चौराहों पर नज़र आएगी तब तक लोग गली-मोहल्लों से गुज़रते हुए बच निकलेंगे और 4 दिन बाद जैसे थे की स्थिति फिर लौट आएगी.

शहर के भीतर अगर सड़क हादसे होते हैं तो उनकी मुख्य वजह पालकों द्वारा 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों को गाड़ी थमा देना, ऑटो चालकों पर नियंत्रण न होना, अव्यवस्थित ट्रैफिक व्यवस्था है. स्कूली बच्चों को गाड़ी न चलाने के निर्देश देना, जागरूक करने की मुहीम चलाना भी केवल साल में एक बार जून-जुलाई के महीने में किया जाता है. गौरतलब है की इस मुहीम की भी अवधि मात्र 4 दिनों की ही होती है. वैसे  स्कूली बच्चों को गाड़ी न देने, सड़क हादसों के प्रति जागरूकता फ़ैलाने में जितनी जिम्मेदारी पुलिस की है उतनी ही जिम्मेदारी पालकों की भी है.
केवल हेलमेट अनिवार्यता ही नहीं आप पिछले अन्य आदेशों को उठा कर देख लीजिये, किसी भी आदेश/मुहीम की अवधि 4 दिन से ज्यादा की नहीं रही है. उदाहरण स्वरुप राजधानी रायपुर के गुढ़यारी स्थित व्यापारियों के व्यवस्थापन का ही मुद्दा ले लीजिये. गुढ़यारी का बाजार राज्य का सबसे बड़ा तेल, अनाज का थोक बाजार है और यहाँ के व्यापारियों को डुमरतराई में व्यवस्थापन हेतु सरकार द्वारा दुकान आबंटित कर दिए गए हैं पर 90% व्यापारी अभी भी गुढ़यारी से ही अपना कारोबार चला रहे हैं और प्रशासन इन कारोबारियों को व्यवस्थापित करने में पूर्ण रूप से असमर्थ है. 2 माह पूर्व इन कारोबारियों को व्यवस्थापित करने मुहीम चलाने का निर्णय लिया गया और अन्य मुहिमों की तरह इस मुहीम ने भी 4 दिन बाद घुटने टेक दिए.
इसी प्रकार रायपुर के नया बस स्टैंड स्थित सरकारी जमीन को खाली करवाने में भी अधिकारियों के पसीने छूट गए हैं. सालों से पंडरी नया बस स्टैंड में एक सरकारी जमीन पर एक निजी बस ट्रेवल्स के मालिक ने अवैध रूप से कब्जा कर रखा है, जिसे खाली करवाने अधिकारी कई बार अपने अमले के साथ गए हैं परन्तु हर बार उन्हें नाकामी ही हाथ आई और अभी भी वह जमीन ट्रेवल्स मालिक के कब्जे में है.

ऐसे बहुतेरे उदाहरण हैं जब आदेश/निर्देश दिए गए पर परिणाम कुछ ना निकला, इसलिए छत्तीसगढ़ के सरकारी महकमे को अपने कार्यशैली की समीक्षा करने की आवश्यकता है. उन्हें बैठ कर विचार करने की ज़रूरत है कि आखिर किसलिए उनके किसी भी मुहीम का कोई सार्थक परिणाम नहीं आता.

हर्ष दुबे
भूतपूर्व छात्र, भारतीय जनसंचार संस्थान,
नई दिल्ली

गुरुवार, 26 नवंबर 2015

मनुष्य की आड़ में जन्म लेते दरिंदे


 26/11 एक ऐसी तारीख है जो हम सभी भारतियों को और जिन विदेशियों ने अपनों को गंवाया उन्हें जीवनपर्यन्त याद रहेगी. आज ही के दिन 7 वर्ष पहले मनुष्य ने साबित कर दिया की संसार में मनुष्य के वेश में दरिंदे/हैवान भी रहते हैं.


हम मनुष्य दम्भ भरते हैं की हमने पुण्य किया होगा जो 84000 योनियों में से हमने मनुष्य योनि में जन्म लिया. पर ईश्वर भी इस संसार में जन्म लिए मनुष्य रुपी दरिंदे/हैवान को देख कर दुखी, हताश, निराश होता होगा. ईश्वर के मन में भी ख्याल आते होंगे कि 84000 योनियों में जिस योनि को मैं सर्वश्रेष्ठ मानता हूँ उसमें आज ऐसे दरिंदे भी शामिल हैं. ऐसे लोगों को देख कर स्वयं प्राणदाता कि आँखें झुक जाती होंगी. जब जान देना ऊपर वाले का अधिकार है तो जान लेने का भी अधिकार उसी का है, हम मनुष्य होते कौन हैं ये निर्णय लेने वाले कि कौन जियेगा और कौन नहीं? पर यह सब बातें उन्हें समझ आने से रही, जो निहत्थे, बेगुनाह, मासूमों को मारने तैयार हो जाते हैं.

अभी भी दुनिया के किसी कोने में कोई हफ़ीज़ सईद होगा जो किसी कसाब को दीन कि रक्षा करने का पाठ पढ़ा रहा होगा, कोई बघदादि भी होगा कोई तालिबानी भी होगा. मुझे तो आश्चर्य होता है वे कैसे बेग़ैरत लोग होते होंगे जिनके दिमाग में ऐसे भरा जाता होगा और उनसे ज्यादा वे लोग जो इसकी अगुवाई करते हैं. इंसान आज वाकई में निर्दयी हो चुका है, ना उसे किसी का खौफ है न मलाल. 7 वर्ष पहले मुंबई में 20-22 साल के 5-6 लड़कों ने बंदूक की नोख पर सैकड़ों बेगुनाहों, मासूमों को मौत कि नींद सुला कर यह दिखा भी दिया.
क्या महिला, क्या बच्चे, क्या बूढ़े, क्या जवान जिस निर्ममता से उन्होंने उस घटना को अंजाम दिया, उसमें सोचनीय यह है की कोई इंसान किसी दूसरे इंसान को इस प्रकार का प्रशिक्षण कैसे दे सकता है. इन हत्यारों का ना कोई धर्म होता है और ना कोई ईमान, ये केवल अपना व्यक्तिगत स्वार्थ साधने के लिए लोगों को बरगलाते हैं. आज पूरे विश्व में इसी प्रकार का वातावरण निर्मति हो चुका है, मानवता तो केवल भाषण/लेखन में प्रयोग होने वाले शब्दों तक सिमित हो चुकी है.
कहा जाता है की 95% दिमाग वालों की अपेक्षा 5% बद्दिमग समाज के लिए ज्यादा हानिकारक हैं, आज पूरा विश्व इसी विपदा से जूझ रहा है, इन्हीं बद्दिमग लोगों की वजह से कलह झेल रहा है जिसके वजह से हर रोज सैकड़ों लोग अपनी जान गवां रहे हैं. वे 5% ही आज पूरे विश्व के लिए चुनौती बनकर खड़े हैं.

बंदूक, हथियारों से बात करने वाले ये लोग ना जाने कब शांत होंगे, किसके कहने से शांत होंगे.

मेरी बस इतनी सी प्रार्थना है : "रघुपति राघव राजा राम, 'उनको' सन्मति दे भगवान".

26/11/2008 को अपनी जान गंवाने वाले मासूमों को, बेगुनाहों को, जवानों को, जाबाज़ों को श्र्द्धांजलि.