बुधवार, 12 नवंबर 2014

वफादार जनता से रमन की बेवफाई!


जाने यह कैसी विडम्बना है कि हमारे लोकतंत्र का प्रमुख हिस्सा होने के बाद भी देश के मध्यम वर्गीय तबके को हमेशा से अनदेखा किया जाता रहा है. वैसे भी सिर्फ अनदेखी बल्कि छल, कपट और धोखा अगर किसी वर्ग के साथ सबसे अधिक हुआ है तो वह भी यह मध्यम वर्ग ही है. सरकारी योजनाएं हों या चुनावी सभाएं या फिर नए प्रधानमंत्री का देशवासियों को किया प्रथम सम्बोधन. इस तबके को हर जगह निराशा ही हाथ आई हैहमारे देश के इतिहास में यह पहला मौका है जब किसी गैर कांग्रेसी  दल को जनता ने पूर्ण बहुमत से संसद में सरकार बनाने का मौका दिया. इस जनादेश में प्रमुख योगदान मध्यम वर्गीय परिवारों का ही माना जा रहा है. यही कारण है कि इस वर्ग को अपने नए प्रधानमंत्री से खुद के दिन संवरने की उम्मीदें बंध गईं थीं. उस भाषण में गाँव, गरीब, दलित, शोषित, वंचित और महिलाएं थी. अगर कोई नहीं था तो उसी मध्यम वर्ग का ज़िक्र.
आज  मध्यम वर्गीय परिवारों के लाखों युवा बेरोज़गारी की मार झेल रहे हैं, परंतु सेंट्रल हॉल से दिए गए 55 मिनट के उस भाषण में अपना कहीं भी ज़िक्र पाकर यह वर्ग भौंचक्का रह गया. हरियाणा के रेवाड़ी से मोदी जी ने अपनी चुनावी सभाओं का आगाज़ किया और तभी से देश भर के मध्यम वर्गीय परिवारों की उम्मीदें बंधनी शुरू हो गई थीं, जो हर बीतते दिन और सभा के साथ बढ़ती चली गईं. ये अपेक्षाएं हीं थीं, जिन्हें जनता ने वोटों के माध्यम से ज़ाहिर किया। नतीजन, आज एक दल अपने बलबूते पर सरकार चला रहा है. वहीँ दूसरी ओर, 125 साल से पुराना दल जनता की निराशा का शिकार हो गया.
इस कड़ी में अगर छत्तीसगढ़ राज्य के मध्यम वर्गीय परिवारों की बात की जाए, तो उनकी हालत नीम चढ़े करेले जैसे दिखती  है.  इसके जनक स्वयं प्रदेश के मुखिया डा. रमन सिंह  हैंराज्य के यशस्वी मुख्यमंत्री जी भी अब बाकी राजनेताओं के रंग में ढलते प्रतीत हो रहे हैं. राज्य में विकास और जनता की मूलभूत सुविधाओं को ध्यान में रखकर योजनाएं बनाने और उनके क्रियान्वयन में माहिर मुख्यमंत्री अब छल, फरेब की राजनीति से अछूते नहीं रह गए हैं. राज्य सरकार के अधीनस्थ कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति आयु में वृद्धि का मामला मुख्यमंत्री  की कार्यशैली में आए बदलाव का सीधा उदाहरण है. उल्लेखनीय है कि 2013 विधानसभा चुनाव में आचार संहिता लागू होने के महज़ पखवाड़े भर पहले मुख्यमंत्री  ने राज्य कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति आयु 60 से बढ़ाकर 62 वर्ष करने की घोषणा की थी. परन्तु अखबारों के माध्यम से रही खबरों की  मानें, तो नई केंद्र सरकार से जब राज्य सरकार ने अतिरिक्त धन मांगा, तो केंद्र ने राज्य सरकार को अपनी घोषणा वापस लेने अर्थात् कर्मचारियों की आयु सीमा 62 से घटाकर 60 वर्ष करने के निर्देश दिए. साल भर पूर्व की गई इस घोषणा से सेवानिवृत्ति की दहलीज पर खड़े कर्मचारियों के चेहरे  खिल गए थे और विधानसभा चुनाव में कर्मचारियों ने वोटों के जरिए अपनी खुशी और वफादारी का इजहार किया। इसी का नतीजा था कि डा. रमन सिंह ने विधानसभा चुनाव में जीत की हैट्रिक लगाई.

गौरतलब है कि 2013 विधानसभा चुनाव के पूर्व पूरे राज्य में सत्ता परिवर्तन की बयार थी. शायद यही वजह है कि रमन सरकार ने जनता को लुभाने के लिए आनन-फानन में कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति आयु सीमा में वृद्धि की घोषणा कर दी थी, लेकिन 2008 की अपेक्षा 2013 में रमन एंड कंपनी के वोट प्रतिशत में कमी आयी. जहां 2008 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के मत प्रतिशत का अंतर 1.24% था, वहीं 2013 आते-आते ये अंतर महज़ 0.75% ही रह गया. इस लिहाज़ से देखें तो यह घोषणा रमन सरकार के लिए ट्रंप कार्ड साबित हुई, जिसके बूते उनकी सरकार की नैय्या पार लगी.

अब मुख्यमंत्री सीमा वृद्धि से होने वाले अतिरिक्त वित्तीय भार का हवाला देकर पल्ला झाड़ने के मूड में  नज़र रहे हैं. अगर ये कदम उठाया गया, तो यह जनता के साथ किया गया एक भद्दा मजाक होगा और इसके लिए जनता उन्हें शायद ही माफ़ करे. एक जिम्मेदार सरकार से जनता यह अपेक्षा करती है कि कोई भी घोषणा करने के पूर्व सरकार उसके हरेक पहलू को ध्यान में रखेगी. लेकिन राजनीतिक लाभ पाने के लालच में की गई इस घोषणा की अब पोल खुलती दिख रही है.
वैसे संभावनाओं को टटोला जाए, तो नजर आ रहा है कि अब रमन सरकार इस साल के अंत में होने वाले नगरीय निकाय चुनाव के खत्म होने का इंतजार कर रही है. चुनाव परिणाम जो भी हों, घोषणा वापस लेने में सरकार जरा सी भी हिचकिचाहट नहीं दिखाएगी.
ऐसे में भविष्य में की जाने वाली सरकार की किसी भी घोषणा को उसके हर एक कोण से देखे जाने की आवश्यकता है. ऐसा ना हो कि वह भी क्षणभंगुर साबित हो और चुनावी हित साधने के बाद उसे भी वापस ले लिया जाए.
मध्य प्रदेश से अलग होने के बाद इंक्रिडिबल इंडिया की तर्ज पर छत्तीसगढ़ को क्रेडिबल का दर्जा देने वाले डॉ. रमन जनता के बीच अपनी विश्वसनीयता खोते जा रहे हैं। और अब इस मध्यम वर्ग को देखते ही मेरे जेहन में ना जानें क्यों सलमा आगा की दो पंक्तियां बरबस ही आ जाती हैं...

" दिल के अरमान आंसुओं में बह गए, हम वफ़ा कर के भी तनहा रह गए "
  

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