गुरुवार, 2 जुलाई 2015

भगवान, अगले जन्म इन्हें VIP ना कीजो !!




अगली बार अगर हवाई यात्रा करें तो किसी केंद्रीय मंत्री या मुख्यमंत्री के साथ करें वैसे उपमुख्यमंत्री भी चलेगा. क्यूंकि उनके साथ जाने में अगर आप टिकट/पासपोर्ट भूल जाते हैं तो भी कोई दिक्कत नहीं. विमान को आपके लिए रोक दिया जाएगा. चौंकिए मत ! सच कह रहा हूँ, अरे भाई आखिर आप  VIP के साथ जा रहे हैं विमान कंपनी आपको सुविधा थोड़ी दे रही है ये तो उसकी जिम्मेदारी है, आपकी लागतदार है वो. आपको ले जाकर वो किसी जन्म  का ऋण चुका रही है.
वहीँ अगर कोई यात्री भड़क कर विमान से उतर जाए और सड़क मार्ग से यात्रा करना चाहे तो सावधान !! तेज रफ़्तार कार से आता कोई अन्य VIP आपको ठोकर मार सकता है, शायद आपको जान भी गँवानी पड़े जैसे आज जयपुर में एक मासूम को गँवानी पड़ी.
पर क्या करें अच्छे दिन हैं ये और आपके सहयोग के बिना ये सपना कहाँ पूरा हो सकता था. अच्छा आप अगर विमान चालक या अन्य सहयोगी दल में से हैं तो VIP से धीमे स्वर में बात करें भले ही उनकी वजह से आपको बाकी यात्रियों से गाली सुननी पड़े अन्यथा आपकी शिकायत गृह मंत्रालय से लेकर उड्डयन मंत्री तक होगी. अगर बार-बार आप उनकी गलती का एहसास कराएंगे और कहेंगे कि उनकी वजह से विमान में देरी हुई तो वो VIP विदेश यात्रा से लौट कर आपके खिलाफ कानूनी कार्यवाही करने की धमकी भी दे सकते हैं. एक बात की गारंटी ज़रूर है कि यात्रियों में अगर कोई 'भक्त' हुआ तो गाली नहीं देगा क्यूंकि परम आदरणीय नरेंद्र मोदी जी ने सभी 'भक्तों' को गाली देने से मना किया है और सब कितने आज्ञाकारी हैं आप तो जानते ही हैं.
वैसे इसे पढ़ने के बाद आपको या तो मुझपर गुस्सा आएगा या #VIPCULTURE से जो परिस्थितियां निर्मित हुई हैं उस पर गुस्सा आएगा. तो कुछ नहीं, केवल एक उपाय है योग करिये और शांत रहिये. वैसे भी मुख्यमंत्री बनने का सपना संजोये बैठी एक महिला भक्त ने कहा है "शांति शांति शांति" का उच्चारण करने से इंद्र देव खुश हो जाते हैं और परिणाम स्वरूप बारिश होती है, अच्छा है इसी बहाने हमारे किसान भाइयों को कुछ राहत मिल जाएगी.
"शांति शांति शांति"

गुरुवार, 18 जून 2015

खतरे में सुषमा का 'स्वराज' ???

वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना ना हो  मुमकिन, उसे एक  खूबसूरत  मोड़  देकर  छोड़ना ही अच्छा  ये लाइनें 2011 में बोफोर्स कांड के आरोपी क्वात्रोची पर फैसला सुनाते वक़्त मजिस्ट्रेट विनोद यादव द्वारा कही गई थीं। क्वात्रोची को बरी कर दिया गया था। पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने इसे शर्म की बात बताई थी कि जिस इंसान को पकड़ने में देश के 205 करोड़ रूपए खर्च हो गए, वह अंत में बरी हो कर निकल गया।
सीबीआई के पूर्व निदेशक विजय शंकर ने कहा था कि इसमें उनके उत्तरवर्ती सीबीआई निदेशकों और वकील अरुण जेटली की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है, जिन्होंने मामले में ढिलाई बरती और मामले को कमजोर किया। नतीजन क्वात्रोची को 2007 में अर्जेंटीना से भारत नहीं लाया जा सका और अब बीजेपी के वर्तमान अध्यक्ष अमित शाह ललित मोदी विवाद में सुषमा स्वराज का पक्ष रखने के लिए क्वात्रोची मामले को ही बेशर्मी के साथ कुतर्क के तौर पर घसीट रहे हैं।

शाह भूल गए कि क्वात्रोची मामले में जितनी जिम्मेदारी सीबीआई की थी, उतने ही जिम्मेदार तत्कालीन वकील और वर्तमान वित्त मंत्री अरुण जेटली भी थे। खैर, जब हमारे प्रधानमंत्री स्वयं गलत तथ्यों के पैरोकार दिखाते हैं तो उनकी संगति का कुछ तो असर माननीय अध्यक्ष महोदय पर भी पड़ेगा।



ललित मोदी की बात करें तो यह IPL में वित्तीय अनियमितताओं का आरोपी हैं और एनफोर्समेंट डायरेक्टरेट (ED) की गिरफ्त में आने के डर (जिसे ललित बेबुनियाद बताते हैं) से भारत से बाहर लंदन और दूसरे शहरों में गुजारा कर रहे हैं।
UPA2 सरकार ने ब्रिटिश सरकार को लिखित में जानकारी दी थी कि ललित के खिलाफ मामला भारत की कोर्ट में विचाराधीन है। ऐसे में उन्हें ब्रिटेन से बाहर जाने की इजाजत न दी जाए। इस बीच सरकार ने ललित मोदी का पासपोर्ट भी निरस्त कर दिया था। 2014 के लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद ललित मोदी ने ट्रैवल डॉक्यूमेंट हासिल करने के लिए फिर से हाथ-पैर मारने शुरू किए


ललित मोदी कथित तौर पर वर्तमान विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से भी मिले। स्वराज परिवार से ललित मोदी का सालों पुराना रिश्ता है। यह बात उसने इंडिया टुडे को दिए इंटरव्यू में स्वीकार की। अगस्त 2014 में ललित मोदी ने भारतीय विदेश मंत्रालय से मदद मांगी ताकि ब्रिटिश सरकार उसे ट्रैवल डॉक्यूमेंट दिलवाए। उनकी दलील थी कि पत्नी मीनल मोदी का पुर्तगाल के अस्पताल में इलाज चल रहा है, जहाँ ऑपरेशन के लिए पति होने के नाते उनका मौजूद होना और हस्ताक्षर करना जरूरी है। हालांकि, कानूनन ऐसी कोई बाध्यता नहीं थी।

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने पहले ब्रिटिश हाई कमिश्नर से बात की और फिर ब्रिटिश सांसद कीथ वाश से बात करके उन्हें पत्र भेजा। तब जाकर ललित मोदी को ट्रैवल डॉक्यूमेंट मिल सका।

गौर करने वाली बात यह भी है कि यूएन के भ्रष्टाचार विरोधी कानून, 2002 पर भारत ने भी हस्ताक्षर किए हैं, जिसके तहत पद का दुरुपयोग कर किसी व्यक्ति की मदद करना/फायदा पहुंचाना भी भ्रष्टाचार कहलाएगा। बावजूद इसके FEMA कानून, कंपनी लॉ, आयकर कानून के अंतर्गत अपराधी पाए गए एक भगोड़े की मदद की गई।
यहां कई सवाल खड़े होते हैं क्या सुषमा स्वराज ने निजी सम्बन्धों के चलते मोदी की मदद की? विदेश मंत्री के इस कदम की जानकारी प्रधानमंत्री को थी? आखिर ऐसी क्या मज़बूरी थी कि कानून से भाग रहे व्यक्ति की इस तरह मदद करनी पड़ी? पूर्व सरकार द्वारा दूसरे देश से लिखित में किए गए ऐसे संवेदनशील संवाद के बाद भी क्या यह कदम उठाना उचित था?

जब इस विषय पर जानकारियां एकत्र कर रहा था, तभी एक और जानकारी मिली कि अपनी पत्नी के ऑपरेशन के 3 दिन बाद ललित मोदी स्पेन के एब्ज़ा में अपनी पत्नी मीनल के साथ जश्न मने रहे थे। तो ऐसी कौन सी बीमारी थी, जिसके कारण उनका पुर्तगाल जाना ज़रूरी था और महज 3 दिनों के अंदर ऑपरेशन भी हो गया और पत्नी जश्न मनाने की स्थिति में भी आ गई? अगर वक्त मिले तो इंस्टाग्राम पर ललित मोदी की पोस्ट की हुई तस्वीरें देखिए। आप को खुद अंदाजा लग जाएगा कि ललित ट्रैवल डॉक्यूमेंट का कितना शानदार सदुपयोग कर रहे हैं।

हालांकि, इस मामले में गलती केवल विदेश मंत्री की ही है, यह कहना सही नहीं होगा। हो सकता है कि  इसके अंदर कुछ अलग ही राजनीति छिपी हो, जिसमें सुषमा स्वराज केवल एक मोहरा हों। इन संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता। इतिहास के पन्नों को पलटें तो नरेंद्र मोदी से जिनकी पटरी नहीं बैठती, वे माहिर हैं उनके लिए ऐसी परिस्थितियां निर्मित करने में, जिसमें व्यक्ति खुद-ब-खुद रास्ते से अलग हो जाता है। इससे इन पर कोई सवाल भी नहीं उठता।

चाहे लाल कृष्णा आडवाणी हों या मुरली मनोहर जोशी या फिर विहिप नेता प्रवीण तोगड़िया, इनका कद एकाएक ऐसा कम हो जाएगा, किसी ने सोचा भी नहीं होगा। कट्टर हिंदूवादी सोच रखने वाले प्रवीण तोगड़िया गुजरात से आते हैं। उनकी मोदी से कुछ ख़ास पटरी बैठती न थी।  मोदी उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री हुआ करते थे तो उन्होंने तोगड़िया को विहिप का अंतरराष्ट्रीय प्रमुख बनवा दिया, जिससे वे देश में कम (खासकर गुजरात से बाहर) और मुख्यतः विदेशों में ज्यादा रहे। आडवाणी और जोशी सांसद होने के नाते, सक्रिय राजनीति में हैं तो ज़रूर, पर अब तो वे शहीदों, पूर्व नेताओं की जन्मदिन-पुण्यतिथि में उनकी मूर्तियों के सामने श्रद्धांजलि देते तक दिखाई नहीं पड़ते।

ऐसा ही कुछ लोकसभा में विपक्ष की पूर्व नेता और मौजूदा विदेश मंत्री के साथ भी होता दिखाई पड़ रहा है। 2009-14 तक संसद में विपक्ष की अगुवाई करने वालीं सुषमा अपनी दमदार छवि की वजह से प्रधानमंत्री पद के दावेदारों में शामिल थीं उन्होंने मोदी के प्रधानमंत्री पद की दावेदारी पर कुछ नाराज़गी भी ज़ाहिर की थी, पर बाद में एक समझदार नेत्री की तरह पार्टी और मोदी, दोनों का समर्थन किया।

पीएम मोदी ने जब इन्हें विदेश मंत्रालय का प्रभार सौंपा, तभी सवाल उठ रहे थे कि क्या यह सुषमा को विदेश मंत्रालय की आड़ में कांटों भरा ताज पहनाया जा रहा है? रातनीतिज्ञ पंडितों ने तो तभी कयास लगा डाले थे कि बस कहीं कुछ ऊंच-नीच हुई और सुषमा को भी बाकी वरिष्ठ नेताओं की तरह गुम होने में वक्त नहीं लगेगा। क्या ललित मोदी विवाद भी उसी का हिस्सा है? राजनीतिक दलों में अंदरूनी गुटबाजियां आम हो चली हैं। बीजेपी भी इससे अछूती नहीं है। तो क्या यह सुषमा के आडवाणी गुट से जुड़े रहने का परिणाम है? अब देखना रोचक होगा कि क्या सुषमा स्वराज का नाम भी मार्गदर्शकों आडवाणी, जोशी की तरह गुमनाम दर्शक होने की राह पर है?

शनिवार, 22 नवंबर 2014

डॉक्टर या यमदूत: अब अस्पताल जाने से भी खौफ खाती है जनता



अरे ऑपरेशन क्या मंत्री करते हैं, जो मृतकों की जिम्मेदारी उन पर डाल कर उन्हें हटा दिया जाए?’ ऐसा बयान दिया मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने, जब बात नसबंदी कांड में स्वास्थ्य मंत्री की जवाबदेही की आई। वो भी एक दौर था जब रेल दुर्घटना की वजह से लाल बहादुर शास्त्री जी ने रेल मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था और ये भी एक दौर है जब 15 घर उजड़ गए, युवक विधुर हो गए और दुधमुंहे बच्चे मातृविहीन हो गए हैं। पर सरकार है कि अपने चहेते मंत्री को बचाने के लिए कांड का सारा ठीकरा आरोपी डॉक्टर पर फोड़ कर बच निकलना चाहती है।




छत्तीसगढ़ का चिकित्सा विभाग तो मानो ढीठ ही हो गया हो। नेत्र शिविर का आंखफोड़वा कांड हो या महिला शिविर में गर्भाशय निकालने का प्रकरण या हाल ही में सालों से बंद पड़े अस्पताल भवन में नसबंदी शिविर का आयोजन। इनमें कितनी महिलाओं ने अपने गर्भाशय गंवाए, कितने लोगों की आंखो की रोशनी चली गई और कई अपनी जान से हाथ धो बैठे।

नसबंदी प्रकरण की जांच के लिए सरकार ने आयोग का गठन कर दिया है। हालांकि, आयोग का गठन तो बस्तर में कांग्रेसी नेताओं की हत्या, कोरबा के चिमनी कांड और भिलाई इस्पात संयंत्र के गैस रिसाव कांड के लिए भी हुआ था। वैसे आयोगों का गठन तो हर प्रकरण के बाद होता है, पर रिपोर्ट किसी की नहीं आती। आयोग का गठन करके मुद्दे दबाने में तो रमन सरकार को महारत हासिल है।
जिस प्रकार यातायात नियंत्रण के नाम पर वाहनों की धर-पकड़ को टारगेट पूरा करने के रूप में देखा जाता है, उसी तरह सरकारें नसबंदी अभियानों को भी एक निर्धारित संख्या पूरी करने के रूप में लेती है। तभी तो स्वास्थ्य मंत्री के गृहजिले में फर्नीचर, उपकरण और तकनीकी साधनों रहित गंदगी भरे भवन में नसबंदी शिविर का आयोजन कर दिया गया और मंत्री जी इसे सिर्फ डॉक्टरों की लापरवाही मान रहे हैं। क्या स्वास्थ्य मंत्री होने के नाते उनका संवैधानिक और प्रशासनिक कर्तव्य केवल फोटो खिंचवाते, फीता काटते, घोषणाएं करते विज्ञापनों में दिखना ही है। अपने क्षेत्र के अस्पतालों में जाकर स्वास्थ्य सेवाओं के क्रियान्वयन का अवलोकन करना उनका कर्तव्य नहीं है?




पूरे प्रशासन की बेशर्मी तो देखिए कि टारगेट पूरा करने की धुन में उन्होंने बैगा जनजाति को भी नहीं बख्शा। छत्तीसगढ़ की इस आदिवासी जनजाति को संविधान की ओर से संरक्षण प्राप्त है। देश में इनकी संख्या बहुत कम रह गई है, ऐसे में इनकी नसबंदी करना एक अपराध है। लापरवाही के चलते बैगा जनजाति की एक महिला की ऑपरेशन के बाद मौत हो गई और कई अन्य महिलाएं अभी भी जिंदगी और मौत के बीच झूल रही हैं। इस कांड में जो भी शामिल हैं, सभी छत्तीसगढ़ की परिस्थितियों से वाकिफ हैं। उस पर भी इस तरह की कायराना हरकत इन्हें दरिंदो की श्रेणी में लाकर खड़ा कर देती है।
गिरफ्तार हुए आरोपी डॉक्टर अपना पक्ष रखते हुए कहते हैं, गलती दवा कंपनी से खरीदी गईं घटिया दवाइयों की है। अब क्या इसके लिए भी स्वास्थ्य मंत्री जिम्मेदार नहीं हैं? ब्लैक लिस्टेड दवा कंपनियों के बदनाम प्रकरण मंत्रियों के संज्ञान में ना हों, ऐसा संभव ही नहीं है। इसके बाद भी अगर वो अपना पल्ला झाड़ लेते हैं, तो धन्य हैं मंत्री जी और साथ ही उन्हें आश्रय देने वाले माननीय मुख्यमंत्री जी।
देखा जाए तो छत्तीसगढ़ सरकार ने लापरवाही की सारी हदें पार कर दी हैं। विभिन्न सरकारी चिकित्सा शिविरों का आयोजन तो करवा दिया जाता है, लेकिन स्वास्थ्य सेवाओं का अवलोकन नहीं किया जाता। अंखफोड़वा कांड और महिलाओं के गर्भाशय निकालने वाले कांड इसके उदाहरण हैं। छत्तीसगढ़ की जनता में अब खौफ सा बैठ गया है। सरकारी अस्पताल हो या शिविर, जनता इलाज कराने में खौफ खाने लगी है।
जिस राज्य का मुख्यमंत्री स्वयं एक डॉक्टर हो, उस राज्य में चिकित्सा संबंधी ऐसे भयावाह प्रकरण देखने को मिलेंगे, ये उम्मीद तो नहीं थी। अपने मुख्यमंत्री के प्रति तीन बार वफादारी दिखा चुकी सीधी-सादी छत्तीसगढ़ी जनता के हिस्से खौफ और धोखे जैसी चीजें आएंगे, उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा होगा।

जिन्होंने आंखे गंवाई, वो अब दुनिया नहीं सिर्फ सपने देखते हैं। कई महिलाएं तो अपनी कोख में बच्चे पालने का सपना भी छोड़ चुकी हैं। सत्ता का प्याला पिए सो रही सरकार अपनी क्रेडिबिलिटी का दंभ भरती है। देखना ये है कि सरकार की ये कुंभकर्णी नींद कब टूटती है।

वैसे एक बात तो तय है कि ज़ुल्म करने वाले, ज़ुल्म सहने वाले दोनों का कोई मज़हब नहीं होता। मरता भी इन्सान है और मारता भी इन्सान है।

बुधवार, 12 नवंबर 2014

वफादार जनता से रमन की बेवफाई!


जाने यह कैसी विडम्बना है कि हमारे लोकतंत्र का प्रमुख हिस्सा होने के बाद भी देश के मध्यम वर्गीय तबके को हमेशा से अनदेखा किया जाता रहा है. वैसे भी सिर्फ अनदेखी बल्कि छल, कपट और धोखा अगर किसी वर्ग के साथ सबसे अधिक हुआ है तो वह भी यह मध्यम वर्ग ही है. सरकारी योजनाएं हों या चुनावी सभाएं या फिर नए प्रधानमंत्री का देशवासियों को किया प्रथम सम्बोधन. इस तबके को हर जगह निराशा ही हाथ आई हैहमारे देश के इतिहास में यह पहला मौका है जब किसी गैर कांग्रेसी  दल को जनता ने पूर्ण बहुमत से संसद में सरकार बनाने का मौका दिया. इस जनादेश में प्रमुख योगदान मध्यम वर्गीय परिवारों का ही माना जा रहा है. यही कारण है कि इस वर्ग को अपने नए प्रधानमंत्री से खुद के दिन संवरने की उम्मीदें बंध गईं थीं. उस भाषण में गाँव, गरीब, दलित, शोषित, वंचित और महिलाएं थी. अगर कोई नहीं था तो उसी मध्यम वर्ग का ज़िक्र.
आज  मध्यम वर्गीय परिवारों के लाखों युवा बेरोज़गारी की मार झेल रहे हैं, परंतु सेंट्रल हॉल से दिए गए 55 मिनट के उस भाषण में अपना कहीं भी ज़िक्र पाकर यह वर्ग भौंचक्का रह गया. हरियाणा के रेवाड़ी से मोदी जी ने अपनी चुनावी सभाओं का आगाज़ किया और तभी से देश भर के मध्यम वर्गीय परिवारों की उम्मीदें बंधनी शुरू हो गई थीं, जो हर बीतते दिन और सभा के साथ बढ़ती चली गईं. ये अपेक्षाएं हीं थीं, जिन्हें जनता ने वोटों के माध्यम से ज़ाहिर किया। नतीजन, आज एक दल अपने बलबूते पर सरकार चला रहा है. वहीँ दूसरी ओर, 125 साल से पुराना दल जनता की निराशा का शिकार हो गया.
इस कड़ी में अगर छत्तीसगढ़ राज्य के मध्यम वर्गीय परिवारों की बात की जाए, तो उनकी हालत नीम चढ़े करेले जैसे दिखती  है.  इसके जनक स्वयं प्रदेश के मुखिया डा. रमन सिंह  हैंराज्य के यशस्वी मुख्यमंत्री जी भी अब बाकी राजनेताओं के रंग में ढलते प्रतीत हो रहे हैं. राज्य में विकास और जनता की मूलभूत सुविधाओं को ध्यान में रखकर योजनाएं बनाने और उनके क्रियान्वयन में माहिर मुख्यमंत्री अब छल, फरेब की राजनीति से अछूते नहीं रह गए हैं. राज्य सरकार के अधीनस्थ कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति आयु में वृद्धि का मामला मुख्यमंत्री  की कार्यशैली में आए बदलाव का सीधा उदाहरण है. उल्लेखनीय है कि 2013 विधानसभा चुनाव में आचार संहिता लागू होने के महज़ पखवाड़े भर पहले मुख्यमंत्री  ने राज्य कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति आयु 60 से बढ़ाकर 62 वर्ष करने की घोषणा की थी. परन्तु अखबारों के माध्यम से रही खबरों की  मानें, तो नई केंद्र सरकार से जब राज्य सरकार ने अतिरिक्त धन मांगा, तो केंद्र ने राज्य सरकार को अपनी घोषणा वापस लेने अर्थात् कर्मचारियों की आयु सीमा 62 से घटाकर 60 वर्ष करने के निर्देश दिए. साल भर पूर्व की गई इस घोषणा से सेवानिवृत्ति की दहलीज पर खड़े कर्मचारियों के चेहरे  खिल गए थे और विधानसभा चुनाव में कर्मचारियों ने वोटों के जरिए अपनी खुशी और वफादारी का इजहार किया। इसी का नतीजा था कि डा. रमन सिंह ने विधानसभा चुनाव में जीत की हैट्रिक लगाई.

गौरतलब है कि 2013 विधानसभा चुनाव के पूर्व पूरे राज्य में सत्ता परिवर्तन की बयार थी. शायद यही वजह है कि रमन सरकार ने जनता को लुभाने के लिए आनन-फानन में कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति आयु सीमा में वृद्धि की घोषणा कर दी थी, लेकिन 2008 की अपेक्षा 2013 में रमन एंड कंपनी के वोट प्रतिशत में कमी आयी. जहां 2008 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के मत प्रतिशत का अंतर 1.24% था, वहीं 2013 आते-आते ये अंतर महज़ 0.75% ही रह गया. इस लिहाज़ से देखें तो यह घोषणा रमन सरकार के लिए ट्रंप कार्ड साबित हुई, जिसके बूते उनकी सरकार की नैय्या पार लगी.

अब मुख्यमंत्री सीमा वृद्धि से होने वाले अतिरिक्त वित्तीय भार का हवाला देकर पल्ला झाड़ने के मूड में  नज़र रहे हैं. अगर ये कदम उठाया गया, तो यह जनता के साथ किया गया एक भद्दा मजाक होगा और इसके लिए जनता उन्हें शायद ही माफ़ करे. एक जिम्मेदार सरकार से जनता यह अपेक्षा करती है कि कोई भी घोषणा करने के पूर्व सरकार उसके हरेक पहलू को ध्यान में रखेगी. लेकिन राजनीतिक लाभ पाने के लालच में की गई इस घोषणा की अब पोल खुलती दिख रही है.
वैसे संभावनाओं को टटोला जाए, तो नजर आ रहा है कि अब रमन सरकार इस साल के अंत में होने वाले नगरीय निकाय चुनाव के खत्म होने का इंतजार कर रही है. चुनाव परिणाम जो भी हों, घोषणा वापस लेने में सरकार जरा सी भी हिचकिचाहट नहीं दिखाएगी.
ऐसे में भविष्य में की जाने वाली सरकार की किसी भी घोषणा को उसके हर एक कोण से देखे जाने की आवश्यकता है. ऐसा ना हो कि वह भी क्षणभंगुर साबित हो और चुनावी हित साधने के बाद उसे भी वापस ले लिया जाए.
मध्य प्रदेश से अलग होने के बाद इंक्रिडिबल इंडिया की तर्ज पर छत्तीसगढ़ को क्रेडिबल का दर्जा देने वाले डॉ. रमन जनता के बीच अपनी विश्वसनीयता खोते जा रहे हैं। और अब इस मध्यम वर्ग को देखते ही मेरे जेहन में ना जानें क्यों सलमा आगा की दो पंक्तियां बरबस ही आ जाती हैं...

" दिल के अरमान आंसुओं में बह गए, हम वफ़ा कर के भी तनहा रह गए "