बुधवार, 2 मई 2018

उदासीन सत्ता और लाल आतंक के बीच संस्कृति बचाने में प्रयासरत आदिवासी समाज

"ऐ जाने वफ़ा ये ज़ुल्म ना कर, गैरों पे करम अपनों पे सितम
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मर जाएंगे हम, ये ज़ुल्म ना कर, गैरों पे करम अपनों पे सितम.."

ये बोल हैं 1968 में आई फ़िल्म 'आंखें' में माला सिन्हा-धर्मेंद्र पर फिल्माए गए एक गाने के। आज इसकी प्रासंगिकता छत्तीसगढ़ के आदिवासियों से है, जो अपनी संस्कृति बचाने संघर्षरत है। ये बोल सरकार की तरफ से हो रही उनकी अनदेखी और 'अंदर वाले' (यही सम्बोधन करते हैं गाँव के लोग नक्सलियों को) की तरफ़ से उनपर हो रहे सितम, ज़ुल्म को बयां करते हैं।

ये वही आदिवासी हैं जिनके हित की रक्षा करने के मकसद से 18 वर्ष पूर्व सन 2000 में मध्यप्रदेश का विभाजन कर छत्तीसगढ़ प्रदेश बनाया गया। 2011 सेंसस के अनुसार प्रदेश की आबादी 2.5करोड़ आंकी गई जिसमें लगभग 33प्रतिशत जनसंख्या आदिवासी है। प्रदेश के उत्तर में सूरजपुर जिले से लेकर दक्षिण में सुकमा जिले तक लगभग 42 जनजातियां प्रदेश में निवासरत हैं जो अपने अस्तित्व को बचाए रखने संघर्षरत हैं और नित नई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।

छत्तीसगढ़ की पहचान घोर नक्सल प्रभावित राज्य के रूप में हो चुकी है जिसके लिए सरकार और मीडिया दोनों बराबर रूप से जिम्मेदार हैं। हालिया चुनिंदा रिपोर्टों को छोड़ दें तो मिडिया ने छत्तीसगढ़ को तभी तवज्जो दी है जब-जब यहां की धरती लाल हुई है।

चाहे प्राकृतिक संसाधनों के भंडारण/उत्पादन की दृष्टि से हो या ऐतिहासिक महत्व या प्राकृतिक सुंदरता किसी भी दृष्टिकोण से छत्तीसगढ़ राज्य देश के अन्य राज्यों से कमतर नहीं है। परन्तु जिस प्रकार इंसान की 99 अच्छाइयां होने के बावजूद चर्चा 1 बुराई की ही होती है, वही हाल छग प्रदेश का है, जिसके लिये मीडिया और सत्ता पक्ष दोनों बराबरी के गुनहगार हैं।

प्रदेश की एक तिहाई जनसंख्या आदिवासी समाज की है जिनकी प्रवृत्ति, जिनका स्वभाव नितांत सरल है और इसी सरल स्वभाव के चलते सत्ता और नक्सलियों के बीच सबसे ज्यादा पिस भी यही समाज रहा है। इनकी सरलता की आड़ लेकर तमाम लोग मौज कर रहे हैं, फल-फूल रहे हैं। आदिवासी समाज की स्थिति में कुछ ज्यादा परिवर्तन आ गया हो ऐसा कहना उनके साथ बेईमानी होगी।


हालांकि छत्तीसगढ़ राज्य प्रगति की ओर अग्रसर है, कई नई ऊंचाइयां छू रहा है, बाकी राज्यों को कई पैमानों में टक्कर देने के साथ उनसे आगे भी है, पर आदिवासी समाज की स्थिति ऊपर और नीचे के दांतों (सत्ता और नक्सली) के बीच फंसे जिव्हा जैसी है।

नेता आते हैं जल-जंगल-जमीन की बातें करते हैं, मुख्यधारा (हालांकि मेरा मानना है कि जिन्हें सरकार मुख्यधारा से जोड़ने की बात करती है असल में वे लोग मुख्यधारा में ही हैं और हम-आप भटक चुके हैं) से जोड़ने की बातें करते हैं पर जमीनी हक़ीक़त कुछ और ही बयां करते हैं।

आज जरूरत है दांतों के बीच फंसे उस जिव्हा को निकालने की जिससे वह खुल कर जी सके। सत्ता पर आसीन नीति निर्माताओं को जरूरत है संवेदनशीलता के साथ आदिवासी समाज से चर्चा करे, उनकी ज़रुरतों को, अपेक्षाओं को पूरा करने नीति निर्धारित करे। नक्सली समस्या को जल्द से जल्द ख़त्म करें। वहीं मीडिया को जरूरत है दिल्ली के स्टूडियो से बाहर निकल कर छत्तीसगढ़ में आए जमीनी तौर पर देखें, समझें और रिपोर्टिंग करे क्योंकि राज्य से बाहर आमजनता के बीच अभी जो धारणा छत्तीसगढ़ राज्य को लेकर इतने वर्षों में मीडिया ने बनाई है वह केवल एक पहलू है उससे इतर इस राज्य में रामायण काल से लेकर बुद्ध के विहार, जैन तीर्थ, बाबा घासीदास के सन्देश, मानव की आवाज़ निकालने वाली मैना, हीरे का भण्डार, चित्रकूट जलप्रपात सहित अनगिनत चीज़े हैं। ज़रूरत है खून, शहादत, लाल आतंक से इतर छत्तीसगढ़ की बाकी अच्छाइयों को लोगों तक पहुंचाने की।

" माना की अंधेरा घना है, पर दिया जलाना कहाँ मना है "

निश्चित रूप से मीडिया सहित लोकतंत्र के चारों स्तम्भ अगर संवेदशीलता के साथ इस ओर कदम बढ़ाएं अंधेरा भी छंटेगा, आदिवासी समाज अपने इच्छानुरूप, अपनी संस्कृति को बचाते हुए बढ़ भी सकेगा और छत्तीसगढ़ राज्य से लाल आतंक वाला उपनाम भी हटेगा।

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